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Wednesday, May 27, 2015

एक कोना राग का' कविता संग्रह

‘एक कोना राग का’ कविता संग्रह मेरे सामने है / मैं देख रही हूँ संवेदना से लबरेज भाव वोध /समय सन्दर्भ/ टूटते बिखरते मूल्य बोध ,सब कुछ एक साथ जीते –जागते परिदृश्य के रूप में उद्द्घाटीत हो रहा /मंजुला जी के पास अद्भुत रचनाकार मन है जिसे ओ शब्दों में पिरो कर एक कोना में सहेजने की कोशिश की हैं / उनकी कवितायेँ मोतियों सी चमत्कृत करती हैं / मार्मिकता उनका प्रिय बोध है ,यह इस कविता के अंश को देखे ---
जीने की उत्कट अभिलाषा
और कुछ करने की आस्था लिए
तुम कहाँ खो गये?
बसंतोत्सव कर आयोजन कर
तुम आते –जाते मार्ग में
कहाँ अटक गये ?
फेंककर ढेरों प्रश्न
बिना उत्तर दिए
कहाँ तिरोहित हो गये?
न जाने कितनी नदियाँ
खामोश बह रही हैं
और मैं निश्चेत, निस्तब्ध, निर्जीव
दोहरा रही हूँ
जीवन का ब्याकरण
हरसिंगार के फूल बीनते हुए
मेरी उदास आँखे
अपलक निहार रही हैं
खाली सड़क और उदास सीढियाँ
बंद दरवाजे तुम्हारे घर के
मेरे मन की उँगलियाँ
रख देती हैं दो फूल श्रद्धा के
तुम्हारे स्मृति –चित्र पर
यूँ तुम्हारी अनुपस्थिती
दर्ज होती है पितृपक्ष में
मेरे मन में
तुम सुन तो लो ! ( पृष्ठ ९०- दो फूल श्रद्धा के
नही सुन पाने का दर्द ..नही आने का दर्द.. / एक कोना राग’ के ‘स्मृति के चंदोबे’खंड को पढ़कर महादेवी के मानस मन के दर्द की झलकियाँ महसूस हुयी.इस तरह के दुःख दर्द और टीस की भी एक गरिमा होती है जिसे मंजुला जी ने अपनी कविताओं में रेशा –रेशा जीती हुयी नजर आती हैं..
तुम्हारी स्मृति में
मैं जलाने लगी हूँ
एक दीया तुलसी पर
सांझ के गहराते ही
ये दीपक भर देता है
मेरे अन्दर आशा का प्रकाश
और उष्मा जिजीविषा की
ज्यों ही मैं मूंदती हूँ आँखे
पुकारती हूँ
तुम चिर निद्रा की चादर
उतार देते हो
और एक सहज हंसी
और मुस्कान के साथ
बैठ जाते हो मेरे मन के कोने में ( पृष्ठ ९३- तुम हो मुझमे )
हर इंसान में कहीं न कहीं एक कवि,कलाकार ,चित्रकार छुपा होता है जिसे कोई कोई बखूबी उकेर देता है ऐसी ही कवियत्री और चित्रकार हैं मंजुला जी/ ‘एक कोना राग का’ कविता संग्रह ऐसा ही एक संग्रह है जिसमे कवि द्वारा कविता के साथ साथ उनकी रेखांकन से भी रूबरू होने का हमे आनंद मिला / मंजुला जी के पास कविता के विविध रंग हैं / ‘फूल कविता वल्लरी’/ ‘एक कोना राग का’/ ‘उज्जवल सम्पूर्ण इकाई / ‘रोती है चिड़िया बैठी मुंडेर पर’ एवं ‘ स्मृति के चंदोबे में तुम’ अद्भुत भाव संसार समाया हुआ है / जैसे कि शीर्षक पढ़कर हमे रागात्मकता की झलक मिलती है परन्तु कई कवितायें ऐसी भी हैं जिनमे उनका काव्य मन छटपटाता है ---
शून्य में जब पुकारती हूँ
उसका नाम
सारे पत्ते हिल जाते हैं / (पृष्ठ ३१- दोहद कामना से)
यहाँ शेफाली झर रही है
और झर रही है
राधा की आँखे
प्रतीक्षा में..( पृष्ठ ३९ –शेफाली कविता से )
रोती है चिड़िया
बैठी मुंडेर
अबकी बेर..( पृष्ठ ७१ –अबकी बेर ‘ से)
इस संग्रह से गुजरते हुए मैंने महसूस की कि मंजुला जी की अनुभूतियों का पटल बहुत ही विस्तृत है /प्राकृतिक सौन्दर्य को जिस खूबसूरती से उन्होंने उकेरा है इतनी गहनता बहुत कम देखने को मिलती है / भाषा इतनी सहज है कि पाठक अनुभूतियों के संसार में विचरण करने लग जायेंगे / भीतर की पीड़ा को अपनी रचनाओं में प्रतिष्ठित कर पाठक को अपने काव्य संग्रह के अनंत प्रवाह में उतरने को विवश कर देती हैं..इस प्रवाह में उतरा हुआ मेरा मन उन्हें अनंत शुभकामनाये देता है !
कवियत्री -मंजुला चतुर्वेदी Manjula Chaturvedi
प्रकाशक- हिन्द-युग्म Hind Yugm Prakashan
1,जिया सराय,हौज खास , नई दिल्ली
-110016-
मूल्य 150 रूपये मात्र 


वसुन्धरा पाण्डेय
इलाहाबाद