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Thursday, March 6, 2014

काव्य संग्रह 'दक्खिन का भी अपना पूरब होता है'



'क्योंकि ये बनते हैं /सदियों के अनुभवों की चासनी में पक कर ही/मैं बताता हूँ उन्हें मुहावरे ही /अन्तिम सत्य नही हुआ करते साबित किया है इसे समय ने ही बार-बार''

सन्तोष चतुर्वेदी के नये काव्य संग्रह 'दक्खिन का भी अपना पूरब होता है' की ये पंक्तियाँ बानगी प्रस्तुत करती है आज गढ़ी जा रही समकालीन कविताओं की ! संग्रह का फ्लैप लिखते हुए वरिष्ठ कवि विजेंद्र लिखते हैं कि'सन्तोष चतुर्वेदी अपनी कविता में उन अछूते तथा अपेक्षित विषयों की ओर भी जाते हैं जहाँ हमारा कुलीनजन जाने से डरता घबराता है !''
लोकधर्मिता की ओर जाती सन्तोष चतुर्वेदी की कविता अपना नया मुहावरा गढ़ती दिखती है !-

''पीढ़ियों से धंधा करते आये मोछू नेटुआ
चिन्तित है अब इस बात पर
कि बेअसर पड़ता जा रहा है साँप का जहर ''

अनगढ़ शिल्प के सुघड़ कविता का रचाव ,अनुकूल भाषा का चयन ,यहाँ तक कि अवधी और भोजपुरी के शब्दों का भी सहज समन्वय इनकी कविताओं की शक्ति है इस संग्रह में शामिल रचनाओं की भाषा सरल है. इनमें क्लिष्ट शब्दों का मोह नहीं दिखता. सीधे, सपाट लहजे में, बोलचाल की भाषा में कही गयी बात सीधे पाठक तक पहुँचती है..कवि को अनंत शुभकामनाओं सहित ...वसुन्धरा पाण्डेय

काव्य संग्रह '' दक्खिन का भी अपना पूरब होता है' ''

कवि- सन्तोष चतुर्वेदी

प्रकाशक -साहित्य भण्डार,50 चाहचन्द जीरो रोड इलाहाबाद

मूल्य - पेपर बैक 50 रुपये /सजिल्द 250/- रुपये